Ghazal Hamari Geet Tumhare
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मीठे आम तो सबको पसंद होते हैं ही, पर कभी अमिया चखी है आपने, खट्टी-खट्ट? कभी फ़ाइव स्टार की चाँदी की प्याली से ऊबकर चौराहे पर कुल्हड़ की चाय के स की ओर भागा तो होगा मन! कभी तो मॉल्स के चमचमाते शीशों के अंदर से झाँककर सड़क पर खड़े चाट के ठेले पर जाकर अटकी ज़रूर होंगी आपकी आँखें! अगर हाँ, तो बिल्कुल आपके लिए ही है ये किताब। ये इंसान के दिमाग़ के उसी लोचे की उपज है, जो लोचा अक्सर और अचानक सब कुछ ठीक होते हुए भी बेचैनी बनकर हम सबके अंदर घुमड़ पड़ता है। वही लोचा, जो इंसान के अंदर अधूरापन बनकर कभी आँख में आँसू दे जाता है, तो कभी सुकून बनकर दिल में आराम पहुँचाता है। सुबह से लेकर शाम तक रोज़ी-रोटी और घर की ज़िम्मेदारियों से अलग ही होता है यह दिमाग़ी लोचा। और जब किसी के अंदर ज़्यादा ही बढ़ता है, तो फिर कभी ग़ज़ल बनती है, कभी गीत। ये ग़ज़लें और गीत आपके अपने हैं, अपने लोगों ने लिखे हैं, इनमें अपनापन भी है और अल्हड़पन भी। नए लोगों ने लिखा है, इसलिए नयापन भी है इनमें। एक बार पलटिए ज़रूर इस किताब को।.
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Book Details
- Publisher
- Hind Yugm
- ISBN
- 9789387464940
- Language
- Hindi