Gurukul : Ek Adhoori Kahani : Vol. 1
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ऊपरी तौर पर एकरैखिक प्रतीत होनेवाला यह उपन्यास कथ्य और विषयवस्तु के लिहाज़ से हमें कई स्तरों पर सम्बोधित करता है। मूलतः यह ज्ञान के उद्भव और सम्प्रेषण के अभाव को महसूस करते हुए उसकी सर्जना का प्रयास करता है। दुनियादारी के प्रिज़्म से दुनिया की विविधता को जानने और पहचानने वाला कर्नल हर शाम पार्थ को सम्बोधित करता है। हर दिन एक नई सुर्ख़ी, हर दिन एक नया उद्घाटन और हर दिन वयस्कता का एक-एक क़दम चढ़ता हुआ पार्थ।
यहाँ पार्थ हमारे मध्यवर्गीय समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधि है जो अपनी दैनिक चर्या से बाहर अक्सर नहीं देख पाता और नतीजतन उस दुनिया और व्यवस्था के बारे में उसकी कोई निर्णायक राय नहीं बन पाती जो उसकी नियति को निर्धारित करती है। कर्नल एक-एक करके उसको न्याय व्यवस्था, आतंकवाद, कारपोरेट जगत, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध आदि पर इधर की स्थितियों से अवगत कराता है।
अन्त में वह आता है पुरुष समलैंगिकता के प्रश्न पर जिस पर आज भी भारतीय समाज और क़ानून दोहरा पैमाना लागू करता है। वह इस नज़रिए को ख़ारिज करते हुए समलैंगिकों, समलैंगिक पुरुषों की सामाजिक स्थिति, उनके भीतरी-बाहरी अकेलेपन और दूसरी पीड़ाओं को रेखांकित करता है और कहता है कि यह लोग न अपराधी हैं, न समस्या। इन्हें दंड की नहीं, समझे जाने की ज़रूरत है।
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Book Details
- Publisher
- Radhakrishna Prakashan
- Edition
- 2nd
- ISBN
- 9788183612241
- Year
- 2008
- Format
- Hardcover
- Language
- Hindi