Europ Mein Antaryatrayen
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हम जो हैं वह हमारे ध्यान में नहीं रहता। हमें जैसा होना चाहिए इसी पर सब टिक गया है। जीवन जो है वह नहीं, उसे जैसा होना चाहिए। यानी 'कैसा होना चाहिए' में हमारी एकमात्र दिलचस्पी रह गई है। इसलिए सब कुछ वांछित और हवाई हो गया है। वास्तव कुछ नहीं रह गया। वास्तविकता से अधिक स्वप्न, भविष्य, जीवनेतर महत्त्वपूर्ण हो गया है। वह एक तरफ शरीर से अधिक आत्मा के सरोकारों, इहलोक से अधिक परलोक की चिन्ताओं के फलते-फूलते आध्यात्मिक भ्रष्टाचार में व्यक्त हो रहा है। दूसरी तरफ किसी भावी आदर्श समाज की स्थापना के वादों, स्वप्न के भ्रमजाल के सिद्धान्तों में। ये सब शक्ति के खेल में शामिल गतिविधियाँ हैं जो अब की वास्तविकता को झुठलाती हैं। यात्राएँ इस वास्तविकता के बीच ही होती हैं और वह जैसी भी हैं, उसका उसी रूप में साक्षात्कार करती हैं।
यात्राएँ की जा सकती हैं, उन्हें लिखना एक इतर काम है। जिस दिन मनुष्य जीवन से एकमेक हो जाएगा शायद उस दिन कुछ कहने की आवश्यकता महसूस न करे। लिखने के लिए एक तरह की 'इन्नोसेंस' चाहिए, दुनियादारी के नाम पर पसरे विचारों में आस्था चाहिए, कुछ होने की भ्रान्ति का सहारा चाहिए। लिखा तभी जा सकता है।
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Book Details
- Publisher
- Radhakrishna Prakashan
- Edition
- 2nd
- ISBN
- 9788183610469
- Year
- 2024
- Format
- Hardcover
- Language
- Hindi