Naari
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चिरन्तन नारी युग-युग के अन्धकार में, उसे तुच्छ करके चिरकाल से आगे बढ़ती जा रही है, दु:ख और विपत्ति के अँधियारे पथ को पददलित करती हुई। उसे कोई भय नहीं है, कोई चिन्ता नहीं है। यही वह भाव है, यही वह मूल-मंत्र है, जिसके इर्द-गिर्द प्रसिद्ध उपन्यासकार सियारामशरण गुप्त जी ने इस उपन्यास का ताना-बाना बुना है, जो रोचक है, उत्कृष्ट मनोरंजन प्रदान करनेवाला है, और दिशाहीन होते समाज को सही दिशा दिखानेवाला भी है।
नारी सहित प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की सृष्टि है। इसी कारण ईश्वर की तरह वह गहन भी है। ईश्वर की तरह ही कष्ट सहन करके ही उसे ईश्वरीय शक्ति उपलब्ध करना होगा। उचित यही है, करणीय यही है। यही वह मान्यता है, यही वह सिद्धान्त है, जिसे इस उपन्यास में निरूपित किया गया है, स्थापित किया गया है। उपन्यास के पात्र जैसे सजीव होकर इन सर्वोच्च मान्यताओं को अपने क्रिया-कलापों और संवादों से इस प्रकार पूर्णता से स्थापित करते चलते हैं कि पाठक के मन-मस्तिष्क पर उसका स्थायी प्रभाव पड़े।
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Book Details
- Publisher
- Lokbharti Prakashan
- Edition
- 1st
- ISBN
- 9788180312076
- Year
- 2009
- Format
- Hardcover
- Language
- Hindi