JAY: MAHABHARAT KA SACHITRA PUNARKATHAN
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आकाश से बहुत ऊपर स्वर्ग है—देवताओं का निवास, उनका स्वर्गलोक। उससे भी ऊपर वैकुंठ है—परम धाम, भगवान का निवास। वैकुंठ के द्वारपाल जुड़वाँ भाई जय और विजय हैं, जिनके दोनों नामों का अर्थ है—‘विजय’। इनमें से एक आपको स्वर्ग में रोककर रखता है, जबकि दूसरा आपको वैकुंठ तक पहुँचाता है। वैकुंठ में आनंद शाश्वत है, जबकि स्वर्ग का सुख केवल तब तक मिलता है, जब तक आप उसके योग्य बने रहते हैं। तो फिर जय और विजय में अंतर क्या है? इस पहेली को सुलझा लिया, तो आप महाभारत के रहस्य को भी समझ लेंगे।
भारत के महानतम महाकाव्य महाभारत, जिसे मूल रूप से ‘जय’ कहा जाता था, के इस रोमांचक पुनर्कथन में देवदत्त पटनायक संस्कृत के मूल महाकाव्य के साथ-साथ उसकी अनेक लोक और क्षेत्रीय परंपराओं की कथाओं को एक सहज और एकीकृत कथा में पिरोते हैं। इनमें छत्तीसगढ़ की पंडवानी, महाराष्ट्र का गोंधल, तमिलनाडु का तेरुक्कूत्तु और कर्नाटक का यक्षगान जैसी परंपराएँ शामिल हैं।
लेखक द्वारा बनाए गए 250 से अधिक रेखाचित्रों से समृद्ध इस पुस्तक के 108 अध्यायों में कई कम ज्ञात विवरण भी सामने आते हैं—जैसे सौ कौरवों के नाम, तमिलनाडु में देवी के रूप में द्रौपदी की पूजा, आस्तिक, माधवी, जैमिनि, अरावन और बर्बरीक की कथाएँ, शकुंतलम् और रामायण के महाभारत-आधारित संस्करण तथा खगोलीय आँकड़ों के आधार पर महाभारत युद्ध का संभावित काल-निर्धारण।
स्पष्ट और सरल शैली में प्रस्तुत यह सुंदर ग्रंथ महाभारत की शाश्वत प्रासंगिकता को उजागर करता है। यह मानव जीवन और उसकी जटिलताओं पर किया गया एक गहन और कभी-कभी असहज कर देने वाला चिंतन है, जिसने 3000 से अधिक वर्षों से भारतीय विचारधारा को आकार दिया है।
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Book Details
- Publisher
- Penguin Swadesh
- ISBN
- 9780143422945
- Format
- Paperback
- Language
- Hindi